बस्तर राइजिंग” — बस्तर की कला, संस्कृति और संभावनाओं की नई यात्रा

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लक्ष्मीनाथ नाग

छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क विभाग और बस्तर संभाग के जिला प्रशासन की संयुक्त पहल “बस्तर राइजिंग” के माध्यम से बस्तर की कला, संस्कृति और लोकजीवन को नई पहचान देने की शुरुआत की गई है।

यह पहल केवल एक सांस्कृतिक यात्रा नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा, उसकी परंपरा और रचनात्मकता को विश्व पटल पर प्रस्तुत करने का अभिनव प्रयास है। “प्लेस ऑफ पॉसिबिलिटी” के संस्थापक पृतुल जैन के नेतृत्व में यह कारवां बस्तर संभाग के सभी जिलों की सकारात्मक कहानियों को नए दृष्टिकोण से सामने ला रहा है।

कला, शिल्प और जीवन से सीधा संवाद

“बस्तर राइजिंग” टीम ने अपने कोण्डागांव प्रवास के दौरान जिले की समृद्ध शिल्प परंपरा को गहराई से समझा।
टीम ने सबसे पहले प्रसिद्ध टेराकोटा कलाकार अशोक चक्रधारी से भेंट की। उन्होंने मिट्टी से कला गढ़ने की सूक्ष्म प्रक्रिया को विस्तार से बताया — किस तरह मिट्टी को गूंथकर, आकार देकर और आग में तपाकर जीवन्त रूप दिया जाता है।
टीम ने उनके द्वारा निर्मित “मैजिक दीये” का प्रदर्शन देखा और उसकी कार्यप्रणाली को समझा। चक्रधारी ने बताया कि इस कला में अत्यधिक धैर्य, अनुभव और सटीकता की आवश्यकता होती है, क्योंकि एक छोटी सी त्रुटि पूरी मेहनत पर पानी फेर सकती है।

लोहे में ढली परंपरा — रॉट आयरन कला

इसके बाद टीम ने प्रसिद्ध रॉट आयरन शिल्पकार तिजुराम बघेल से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि यह कला उनके पूर्वजों की धरोहर है — जब उनके परिवार के लोग पत्थरों से लोहा निकालते थे और उससे औजार, पूजा की वस्तुएँ व अन्य उपयोगी सामग्री बनाते थे।
उन्होंने बताया कि पहले यह लोहा बीज संरक्षण के लिए भी उपयोग में लाया जाता था — बीजों के साथ पिघला हुआ लोहा रखने से कीड़े नहीं लगते थे।
बघेल ने पारंपरिक त्यौहार “अमुस तिहार (हरेली)” का भी उल्लेख किया, जिसमें घरों की चौखट पर लोहे की कील ठोकी जाती है ताकि नकारात्मक शक्तियाँ घर में प्रवेश न कर सकें।

प्राकृतिक खेती की दिशा में अग्रसर

टीम ने इसके बाद डा. राजा राम त्रिपाठी से भेंट की। उन्होंने प्राकृतिक और पारंपरिक खेती के महत्व पर चर्चा की और बताया कि नेचुरल फार्मिंग ही भविष्य की खेती है।
टीम ने उनके चिखलपुट्टी स्थित फार्म का भ्रमण किया, जहाँ काली मिर्च और विविध औषधीय पौधों की खेती की जा रही है।
डा. त्रिपाठी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) अब एक वास्तविकता है और इसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ रहा है।

समाज और संस्कृति को जोड़ने का प्रयास

टीम ने अंत में “साथी संस्था” के संस्थापक भूपेश तिवारी से भी मुलाकात की। उन्होंने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के अपने अनुभव साझा किए और इस बात पर बल दिया कि बस्तर के शिल्पकारों के जीवन को सुधारने के लिए संस्कृति और पर्यटन को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए।

जनभागीदारी आधारित विकास की मिसाल

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की जनभागीदारी आधारित विकास की अवधारणा के अनुरूप यह पहल बस्तर के युवाओं, कारीगरों और कलाकारों को नई दिशा दे रही है।
“बस्तर राइजिंग” न केवल उनकी प्रतिभा को पहचान दिला रही है, बल्कि उन्हें आर्थिक सशक्तिकरण की राह पर भी अग्रसर कर रही है।

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